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सोमवार, 26 सितंबर 2011

जय राम (परशु)



जय राम (परशु) श्री राम जय जय राम ............राम नाम पर विहंगम सोच बनाने की जरुरत है.........
मंगलवार, 19 जुलाई 2011

गांधी

गांधी का देश है गांधी का रुपये, गांधी का नशा, गांधी का भ्रष्टाचार, गांधी का राज है भाई ...
गुरुवार, 7 जुलाई 2011

गंगा


भाई बद्रिनाथ यात्रा के समय अनुभव हुआ है…... अलख्न्न्नदा + मन्दाकनी + भागीरथी + अन्य = गंगा (देवप्रयाग से)…… जब सनातन समस्त सम्प्रदाय की धारा मिल जाएँ तो भारतवर्ष मे पुन: सनातन गंगा निकल पडेगी तभी राष्ट्र का कल्याण है.......आज एक महिला के पच्छिम देश  भारत पर एक  सम्प्रदाय को मजबूत करने का कवायद कर रहे हैसरस्वती शायद विलुप्त होने कि वजह से हमारी यह हालात है……
बुधवार, 6 अप्रैल 2011

जन गण मन की अदभुद कहानी ........... अंग्रेजो तुम्हारी जय हो ! .........

Email Se Mila
We don't know whats the real things behind this all but let know tell you that this is not real Aajadi which we get in 15 Aug.'1947 that is only transfer of power from Gore angrej to kale angrej. Real freedom we have to still get.    
I am forwarding you related E-mail soon. Request if you like & understand them right then please forward them to all your friends/relatives
 


 
 

जन गण मन की अदभुद कहानी ........... अंग्रेजो तुम्हारी जय हो ! .........

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुवा करता था | सन 1911 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुवे तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए बंगाल से राजधानी को दिल्ली ले गए और दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया | पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुवे थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये | इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया |  

रविंद्रनाथ टेगोर पर दबाव बनाया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा | मजबूरी में रविंद्रनाथ टेगोर ने बेमन से वो गीत लिखा जिसके बोल है - जन गण मन अधिनायक जय हो भारत भाग्य विधाता .... | जिसका अर्थ समजने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो कि खुसामद में लिखा गया था | इस राष्ट्र गान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है - 

भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है | हे अधिनायक (तानाशाह) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो | तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो !  तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब सिंध गुजरात महारास्त्र, बंगाल  आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना गंगा ये सभी हर्षित है खुश है प्रसन्न है .............  तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है | तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | 

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और IPS ऑफिसर थे | अपने बहनोई को उन्होंने एक लैटर लिखा | इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत जन गण मन अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है | इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है | इसको न गाया जाये तो अच्छा है | लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं बताया जाये | लेकिन कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे |  

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गया गया | जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया | क्योंकि जब स्वागत हुवा तब उसके समज में नहीं आया कि ये गीत क्यों गया गया | जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की | वह बहुत खुस हुवा | उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये | रविन्द्र नाथ टैगोरे इंग्लैंड गए | जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरुष्कार समिति का अध्यक्ष भी था |  उसने रविन्द्र नाथ टैगोरे को नोबल पुरुष्कार से सम्मानित करने का फैसला किया | तो रविन्द्र नाथ टैगोरे ने इस नोबल पुरुष्कार को लेने से मन कर दिया | क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब सुनाया | टेगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरुष्कार देना ही चाहते हो तो मेने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो | जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टेगोर को सन 1913 में  नोबल पुरुष्कार दिया गया | उस समय रविन्द्र नाथ टेगोर का परिवार अंग्रेजो के बहुत नजदीक थे | 

जब 1919 में जलियावाला बाग़ का कांड हुवा, जिसमे निहत्ते लोगों पर अंग्रेजो ने गोलिया बरसाई तो गाँधी जी ने एक लैटर रविन्द्र नाथ टेगोर को लिखी जिसमे शब्द शब्द में गलियां थी | फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टेगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुवे हो ? रविंद्रनाथ टेगोर की नीद खुली | इस काण्ड के बाद टेगोर ने विरोध किया और नोबल पुरुष्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया | सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ तेगोरे ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो   के खिलाफ होने लगे थे |  7 अगस्त 1941 को उनकी म्रत्यु हो गई |  और उनकी म्रत्यु के बाद उनके बहनोई ने वो लैटर सार्वजनिक कर दिया |

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी | लेकिन वह दो खेमो में बट गई | जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे | मतभेद था सरकार बनाने का | मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत कि सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार बने |  जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है | इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए  और गरम दल इन्होने बनाया |  कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए| एक नरम दल और एक गरम दल | गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक , लाला लाजपत राय | ये हर जगह वन्दे मातरम गया करते थे | और गरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु | लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे | उनके साथ रहना, उनको सुनना , उनकी मीटिंगों में शामिल होना |  हर समय अंग्रेजो से समझोते में रहते थे | वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी |  नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत जन गण मन गाया करते थे |  

नरम दल ने उस समय एक वायरस छोड़ दिया कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गया चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती  (मूर्ती पूजा) है | और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है | उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे | उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना  कर दिया |  इसी झगडे के चलते सन 1947 को भारत आजाद हुआ | 

जब भारत सन 1947 में आजाद हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली |  संविधान सभा कि बहस चली | जितने भी 319 में से 318 सांसद थे उन्होंने बंकिम दास चटर्जी द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमती जताई| बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना | और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु | वो कहने लगे कि क्यों कि वन्दे मातरम से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए | (यानी हिन्दुओ को चोट पहुचे तो ठीक है मगर मुसलमानों को चोट नहीं पहचानी चाहिए) | 

अब इस झगडे का फैसला कोन करे | तो वे पहुचे गाँधी जी के पास | गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो में भी नहीं हु और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत निकालो |  तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया - विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा | लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुवे | नेहरु जी बोले कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता | और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है | 

और उस दौर में नेहरु मतलब वीटो हुवा करता था | यानी नेहरु भारत है, भारत नेहरु है बहुत प्रचलित हो गया था | नेहरु जी ने जो कह दिया वो पत्थर कि लकीर हो जाता था | नेहरु जी के शब्द कानून बन जाते थे |  नेहरु ने गन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भरतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है - 

भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है | हे अधिनायक (तानाशाह) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो | तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो !  तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब सिंध गुजरात महारास्त्र, बंगाल  आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना गंगा ये सभी हर्षित है खुश है प्रसन्न है .............  तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है | तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | 

हाल ही में भारत सरकार का एक सर्वे हुवा जो अर्जुन सिंह की मिनिस्टरी में था | इसमें लोगों से पुछा गाया था कि आपको जन गण मन और वन्देमातरम में से कोनसा गीत ज्यादा अच्छा लगता है तो 98 .8 % लोगो ने कहा है वन्देमातरम |  उसके बाद बीबीसी ने एक सर्वे किया |  उसने पूरे संसार में जितने भी भारत  के  लोग रहते थे उनसे पुछा गया कि आपको दोनों में से कौनसा ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम |  बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम लोकप्रिय है | कई देश है जिनको ये समझ  में नहीं आता है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है | 

............... तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का | अब आप तय करे क्या गाना है ?
गुरुवार, 24 मार्च 2011

संत कबीरदास



पर नारी का राचना, ज्यूं लहसून की खान।
कोने बैठे खाइये, परगट होय निदान।।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि पराई स्त्री के साथ प्रेम प्रसंग करना लहसून खाने के समान है। उसे चाहे कोने में बैठकर खाओ पर उसकी सुंगध दूर तक प्रकट होती है
पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय
कबहुं छेड़ि न देखिये, हंसि हंसि खावे रोय।
संत कबीर दास जी कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को अपने लिये पैनी छुरी ही समझो। उससे तो कोई विरला ही बच पाता है। कभी पराई स्त्री से छेड़छाड़ मत करो। वह हंसते हंसते खाते हुए रोने लगती है।
पाश्चात्य सभ्यता के प्रवेश ने भारत के उच्च वर्ग में जो चारित्रिक भ्रष्टाचार फैलाया उसे देखते हुए संत कबीरदास जी का यह कथन आज भी प्रासंगिक लगता है। फिल्मों और टीवी चैनलों के धारावाहिकों में एक समय में दो बीबियां रखने वाली कहानियां अक्सर देखने को मिलती हैं, भले ही कुछ फिल्मों में हास्य के साथ दो शादियों की मजबूरी बड़ी गंभीर नाटकीयता के साथ प्रस्तुत की जाती है पर उनका सीधा उद्देश्य समाज में चारित्रिक भ्रष्टाचारी को आदर्श की तरह प्रस्तुत करना ही होता है। फिल्म हों या टीवी चैनल उन पर नियंत्रण तो उच्च वर्ग का ही है और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को फिल्म और टीवी चैनलों के धारावाहिकों में आदर्श की तरह प्रस्तुत करने का उद्देश्य अपने धनिक प्रायोजकों को प्रसन्न करना ही होता है।
हमारे महापुरुषों ने न केवल सृष्टि के तत्व ज्ञान का अनुसंधान किया है बल्कि जीवन रहस्यों का बखान किया है। चाहे अमीर हो गरीब दो पत्नियां रखने वाला पुरुष कभी भी जीवन में आत्मविश्वास से खड़ा नहीं रह सकता। इसके अलावा पाश्चात्य सभ्यता के चलते पराई स्त्री के साथ कथित मित्रता या आत्मीय संबंधों की बात भी मजाक लगती है। यहां एक वर्ग ऐसे गलत संबंधों को फैशन बताने पर तुला है पर सच तो यह है कि पश्चिम में भी इसे नैतिक नहीं माना जा सकता। जब इस तरह के संबंध कहीं उद्घाटित होते हैं तो आदमी के लिये शर्मनाक स्थिति हो जाती है। कई जगह तो पुरुष अपनी पत्नी की सौगंध खाकर संबंधों से इंकार करता है तो कई जगह उसे सफाई देता है। भारत हो या पश्चिम अनेक घटनाओं में तो अनेक बार पति के अनैतिक संबंधों के रहस्योद्घाटन पर बिचारी पत्नी सब कुछ जानते हुए भी पति के बचाव में उतरती हैं। साथ ही यह भी एक सच है कि ऐसे अनैतिक संबंध बहुत समय तक छिपते नहीं है और प्रकट होने पर सिवाय बदनामी के कुछ नहीं मिलता। इसलिये पुरुष समाज के लिये यही बेहतर है कि वह न तो दूसरा विवाह करे न ही दूसरी स्त्री से संबंध बनाये। ऐसा करना अपराध तो है ही अपने घर की नारी का सार्वजनिक रूप से तिरस्कार करने जैसा भी है।
मंगलवार, 8 मार्च 2011

माँ तुझे नमन

माँ तुझे नमन


आखिर  किसी   भी आदमी को कुछ भी बनाने के लिए एक माँ की जरुरत होती है
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

मेरी खबर: संप्रदाय एक गुरु पम्परा

संप्रदाय एक गुरु पम्परा

विश्व के समस्त संप्रदाय एक गुरू परम्परा के वाहक हैं, यदि सभी गुरू अपने गुरूओं की मूल भावना को समझ लें व स्वीकार लें तथा उस मार्ग पर चल पडें तो कहीं कोई झगडा नही रह जाएगा । अत्याचार और अन्याय के लिये कहीं भी,किसी भी संप्रदाय में कहीं कोई जगह नही है । वास्तव में सत्ता के लोभी तथाकथित संतों नें बहुत खून बहा दिया है और तो और इसका लबादा पहने गुरू का मकसद ही बदल दिया है जिसकी वजह से लोग गुरू शब्द से ही दूर होने लगे हैं । वैदिक व्यवस्था सनातन और शाश्वत है जिसकी ओर लौट आने में ही मानव समाज की भलाई है । 


नैतिक शिक्षा से चाल चरित्र चिन्तन ठीक होता है .... यदि ये ठीक हो तो राष्ट्र निर्माण में मदद मिलाती है ..... सांप्रदायिकता को किसी गुरु या सदगुरु ने नहीं पैदा किया इस कार्य के लिए अनुयायी जिम्मेदार है .... कोटिल्य यदि कठोर नहीं होते तो भारत का निर्माण संभव नहीं होता ....पुरोधा वर्ग को सजग कर ही क्रांति या शांति जरुरत के अनुसार कि जा सकती है.....
शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

हिंदुस्तान नपुंसक है ।

सोचो ... सोचो... और सोचो कि भला मैने ये तस्वीर क्यों लगाई या ऐसी  हेडलाइन्स क्यों बनाई । आप चाहे जो सोचें... भाई हमने तो सोचा कि जब यासिन जैसा देशद्रोही खुलेआम हमारे देश में हमारी ही ऐसी की तैसी कर रहा है और भाजपा के फेंकें जूते उस तक नही पहुंच पा रहे हैं तो हम तो नपुंसक ही हुए ना और जब हम ही नपुंसक है तो सारा देश नपुंसक नही हुआ क्या ( क्यों .. पाकिस्तान को आतंकीयों का देश कहते हैं कि नही)  । अब जरा कुछ बातें करें अपने देश की एक प्रजाती की जिसे हम हिजडा या किन्नर कहते हैं । क्यों कहते हैं ये नही सोचते ... बस कहते हैं .... । जब वे हमारी दुकानों पर या मकानों में या फिर ट्रेनों पर वसूली अभियान करते हैं तो हम क्या करते हैं .... खुदको उन हिजडों के आतंक से बचाने के लिये 10-20 रूपये दे देते हैं । बस.... कुछ वैसा ही तो हम काश्मीर के लिये कर रहे हैं । वो हिजडे हम पर, हमारे देश पर आँखे गडाते जा रहे हैं, हिंदुओं को निर्ममता से मार रहे हैं, तिरंगे को अपना मानने से इंकार कर रहे हैं और हम उन हिजडों को बजाय ये कहने के की मर्द हो तो सामने आकर लडो.... चुपचाप नपुंसकों की तरह  बैठ गये हैं । 
                                              हे मेरे प्यारे नपुंसक साथियों आओ अपने देश की खातिर अपने अंदर कुछ जोश उत्पन्न करने वाली दवाइयों का सेवन कर लें । चलो.. .....  शहिदे आजम भगत सिंह, उधम सिंह या फिर चंद्रशेखर आजाद की भस्म को तलाश करें और उस भस्म में खुदीराम बोस की जवानी को  कारगील के शहीदों के जुनून में मिलाकर पी लें ....... शायद ये दवा हमारे भीतर कुछ मधर्नगी का अहसास पैदा कर सके ।
                                              हाहाहाहाहाहाहाहा .... मैं कोई मजाक नही कर रहा हूँ .. लेकिन सचमुच आज अपने भीतर के मर्द को मरा हुआ पा रहा हूँ क्योंकि मेरे जीवन में मेरी पत्नि और  10 और 8 साल के अपनें  बच्चों की जवाबदारी है और उनका मेरे सिवाय कोई नही है, इस कारण मैं अपने साथ साथ उन सभी देश प्रेमियों के जज्बातों को समझ सकता हूँ जो अकेले परिवार के है और उन हिजडों के खुले आतंक को अपने परिवार की खातिर चुपचाप सह रहे हैं जो देश पर लगातार हमले कर रहे हैं ।
                                         खैर... 2 शब्दों के साथ अपना लेख समाप्त करता हूँ कि - धन्यवाद हमारी 100 करोड की नपुंसक जनता को जो 1000 नेताओं के रहमो करम पर अपना देश बेच चुके हैं । जय हिंद ।।
गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

क्या चीज है मानवाधिकार संगठन

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन की जमानत की याचिका खारिज कर दी है. उन्हें माओवादियों की मदद के आरोप में उम्र कैद की सजा दी गई है जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो रही है. सेन को भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में 2007 में गिरफ्तार किया गया. हाल में ही उन्हें देशद्रोह का दोषी करार देते हुए अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई. सरकारी वकील यह साबित करने में सफल रहे सेन माओवादियों को शहरी इलाकों में अपना नेटवर्क खड़ा करने में मदद दे रहे हैं. हाई कोर्ट में जमानत की याचिका खारिज हो जाने के बाद सेन के वकील महेंद्र दुबे ने कहा, "अब हमारे पास यही एक विकल्प है कि सुप्रीम कोर्ट जाएं."
                                                     जाएँ ,,, सुप्रीम कोर्ट ही नही अमेरिका में भी इस मामले को ले जाया जाये... लेकिन सोचें कि आखिर ये मामला है क्या जिसके लिये मानवाधिकार संगठन इतनी हायतौबा मचा रहा है । मानवाधिकार संगठन का अधिकार सीमित है उसे उन मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नही है जो कोर्ट में चल रहे हों .... लेकिन यहां तो मामला मानवाधिकार संगठन के कार्यकर्ता के ऊपर चल रहा है और छत्तीसगढ हाईकोर्ट के फैसले नें दुनिया भर में साबित कर दिया है कि किस तरह से मानवाधिकार संगठन की आड में माओवादियों (चीन) को मदद दी जा रही है । एक तरह से हमारी न्यायपालिका नें चीन को बेनकाब करने की कोशिश की है ।
                                               अभी तक   मानवाधिकार संगठन की आड में केवल इसाई मिशनरीयां (इनका मिशन होता है ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने धर्म से जोडना)  काम कर रही थी जो सेवा के नाम पर दूरदराज के गांव में जाकर आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कर रही थी । इलाज तभी करती थी जब बीमार का पूरा परिवार इसाई बन जाता, बच्चों को तभी दाखिला देते जब उसके माता पिता इसाई बन जाते । जब उनका मिशन पूरा हो गया तो उनका सेवा भाव भी निपट गया तब उनकी जगह ले लिये माओवादियों ने और मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में नक्सलियों तक हथियार पहुंचाने या सामान ढोने का काम शुरू कर दिये ।
                                                 ना तो धर्म परिवर्तन रूकेगा औऱ ना ही माओवादियों के हथियार गिरेंगे और  हमे इश बात से ही संतोष मिल जायेगा कि चलो बिनायक सेन को द्रेशदोरोह के आरोप में सजा तो मिली ।

अरेरेरेररेरेरेरेरेरेरे ... रूको भाई मैं कोई रंगभेदी नही हूँ .. केवल पत्रकार भी नही हूँ ... मैं तो एक अमीर देश की गरीब जनता के बीच का आदमी हूँ जो काले गोरे आदमीयों तक का भेद तो समझ नही सका है फिर भला काले सफेद धन के बारे में क्या समझता । लेकिन अब समझना चाहता हूँ क्योंकि मुझे अब बच्चों के स्कूल फिस पटाने में समस्या आने लगी है, सब्जी खरीदने की जगह केवल चाँवल पकाकर उसे नमक अचार डाल कर खा रहा हूँ, पेट्रोल ना भर पाने के कारण अब साइकिलिंग कर रहा हूँ , बिजली बिल ना पटा पाने के कारण अवैध रूप से बिजली खींच कर घर को रोशन कर रहा हूँ, .... मैं एक गोरा आदमी हूँ और बडी मुश्किल से अपना जीवन गुजार रहा हूँ ....
         लेकिन गुस्से से मेरा मन भर जाता है
                                           जब उस काले को देखता हूँ जिसके कुत्ते
डॉग ट्रेनर के घर कार से जाकर ट्रेंड हो रहे हैं, जिसका रसोइया कार में बैठ कर बाजार जाता है और गाडी भर कर सब्जी लाता है, उसके घर पर रोज दावतें हो रही है और मैं रात भर डीजे की आवाज सुन कुढता रहता हूँ , लेकिन मैं इसमें उस काले को दोषी नही मानता ............. मैं उसे दोषी मानता हूँ जिसे विदेश में काला कहकर रात के समय ट्रेन से उतार दिया जाता है और वह अपने पर हुए अपमान से कुढकर सारे हिंदुस्तान को चलती ट्रेन से उतार रहा है । अब वह सफेद और काले में भेद भाव कर रहा है और मुझ गोरे को छोड उस काले के साथ सफर कर रहा है ... जिसके घर पर बिना अनुमती घुसने पर गोली मारने का आदेश है और वह काला सा बदसूरत आदमी अपने कुछ हजार साथियों के साथ मुझ जैसे करोडों गोरों पर  राज कर रहा है ।
....
                                        हे मेरे गोरे भाइयों मेरी सहायता करो ... थोडी सी कालिख मेरे लिये भेज दो ताकि मैं भी काला बन जाऊँ ।
रविवार, 9 जनवरी 2011

आध्यात्म से आत्मा

आप हैं एक साधारण से शरीर में असीमीत आध्यात्म शक्तियों के भण्डार रखे हुए हुये श्री कृष्णानन्द जी महाराज । इनके बारे में मुझे हमारे साथी मित्र डी.डी.1 के आँखो देखी के  कमल शर्मा जी नें बताये (बताये क्या बता बता कर दिमाग खा गये थे) जब सुनो तब गुरूदेव करेंगे, गुरूदेव बतायेंगे सुन सुन कर भेजा आउट हुए जा रहा था गुरूदेव का आगमन 2 जनवरी को भिलाई में हुआ सो जाहिर है कि जाना तो पडा ही और जब गया तो दर्शन भी होना था अपने मित्र अनिल राठी के साथ अग्रसेन भवन पहुंचा जहां गुरूदेव पधारे थे । लेकिन ये क्या ..... दोपहर 2 बजे से शाम के 5 बज गये पर गुरूदेव के दर्शन ही नही हुये । दिमाग उखड गया तो वापस अपने घर की ओर चल दिये । 3 तारिख को कुछ सामान छोडने के लिये दुसरे दिन मैं अकेले भवन गया तो कमल शर्मा जी नें अपने गुरू भाइयों से परिचय करवाये जो तिल्दा के थे कुछ देर रूकने के बाद मैं वापसी के लिये निकलना चाहा तो एक मित्र नें कहे कि अब थोडी देर रूक जाओ भाई गुरूदेव से मुलाकात कर लो लेकिन मैं अपनी व्यस्तता बताते हुए बाहर निकला तो दो लोग किसी गुप्त विज्ञान की कक्षा की बात कर रहे थे उनकी बातें सुन कर मैं रूक कर उनसे चर्चा करने लगा तो पता चला कि दुसरे दिन (4 जनवरी) को दिव्य गुप्त विज्ञान की कक्षा लगने वाली है जिसकी फिस 2500 रूपये है । अब क्या था जहां सुना कि पैसे देकर कुछ मिलने वाला है तो तुरंत शर्माजी को पकडा और फटाफट अपना नाम दर्झ करवा दिया पता चला कि मुझे सबेरे 8 बजे तक पहुंचना है थोडा सा मन कुनमुनाने लगा फिर भी सोचा चलो एक दिन की तो बात है आखिर बिना गुरूदेव के दर्शन किये दुसरे दिन सीधे कक्षा में जा पहुंचा सिखना प्रारंभ हुआ कुछ देर तो लगा मैं सिख रहा हूँ फिर उसके बाद तो मैं मैं ही नही था बिना खाए पिये शाम को 5 बजे तक जडवत सब सिखता रहा । अद्भुत चीजें , अद्भुत, ज्ञान ... सब कुछ अलग अलग सा कोई सन्यास की बातें नही ठोस भौतिकी ज्ञान फर्क रहा तो इतना कि अपने प्राचीन दिव्यास्त्र ज्ञान को पाने के बाद मैं अपने को धन्य समझने लगा और मन में आय़ा कि जिस सद्पुरूष के आचार्य़ ऐसे हैं तो वे स्वयं कैसे होंगे इसलिये दुसरे दिन प्रातः 7 बजे जाकर अपने जीवन की प्रथम गुरूदीक्षा ग्रहण कर लिया ।
                                    मैने 2500 रूपयों के बदले में ऐसा हथियार पाया कि तोप तलवार सब धरे रह जाएं । अब मैं अपने को एक समर्थ पुरूष कह सकता हूँ । मैं अपने दिव्यास्त्रों के प्रयोग से आप की भी मदद करने में अपने को सक्षम पा रहा हूँ लेकिन गुरूदेव की आज्ञा होगी तभी । अब आपको लग रहा है कि मैं झेला रहा हूँ (जैसे कभी कमल जी मुझे झेलाते थे ) लेकिन ये एक ऐसा सत्य है जिसके बिना हम सब अधुरे हैं । मैं ब्रह्मकुमारी , श्री रविशंकर जी, आसाराम बापू के शिष्यों की भी संगत रखे हुए था उनके आश्रमों में यदा कदा चले जाता था लेकिन जो दिशा मुझे परम पुज्य गुरूदेव श्री कृष्णानन्द जी महाराज से मिली वह पूर्णता की ओर ले जाती है । मैने गुरूदेव की रचित तीन पुस्तकें स्वर से समाधी (यदि आपने संभोग से समाधी पढे हैं तो इसे जरूर पढें ), यंत्र-मंत्र रहस्य और कहै कबीर कुछ उद्यम कीजै .. लेकर आया और पढने बैठा ...... यकिन जाने दिमाग में लगातार विस्फोच सरीखे होने लगे हर वाक्य से कुछ ना कुछ सिखने को मिल रहा था । जहां संत जन कहते हैं कि क्या रखा है इस संसार में वहीं हमारे गुरूदेव कहते हैं कि सब कुछ इसी संसार में है बाहर कुछ नही है । और जब मैने अपने शरीर में झांका तो सारा स्वर्घ यहीं पर था । टेली पैथी का नाम सुना था अब स्वयं कर रहा हूँ (अभी तो केवल गुरूदेव का आदेश या समझाइश आती है )  मैं ये सब लिख रहा हूँ क्योंकि गुरेव के आदेश पर ही ये सब लिखना हो रहा है । मैं विगत एक माह से घर से बाहर रहा इसलिये मेरी इंरनेट लाइन कट चुकी है फिर भी आज सुबह अनायास चालू मिली और मै यह सब अब लिख रहा हूँ बिना इंटरनेट के ..... हाहाहाहाहाहा 
                                   है ना मेरी हंसी उडाने का सबसे अच्छा शब्द लेकिन यही सत्य है । गुरूदेव  अपनी सभा में किसी नेता अधिकारी या भ्रष्टाचारी के हाथों सम्मानीत नही होते वे ऐसे लोगों से दूर रहते हैं जो देश को क्षति पहुंचाते है लेकिन अपने पुत्रों (शिष्यों ) को उनसे लडने के लिये हथइयार दे रहे हैं । वे कहते हैं कि यदि कोई भ्रष्टारी सामने आये तो पहले उसे समझाओ ना समझे तो उसे छोटा सबक सिखाओ फिर भी ना माने तो उसका पद समाप्त कर दो । अभी तो मैं अपने आपको गुरूसेवा में 21 दिनों के लिये बंद करके रखा हुआ हूँ तीन दिनों में जो मिला है उससे 21 दिनों बाद के अपने स्वयं के होने की कल्पना करके रोमंच भी होता है । मैं अपने को मानसिक रूप से बेहतर समझता था (कभी किसी नें सम्मोहित नही कर पाया) लेकिन अब क्या हुआ है मैं स्वयं नही जानता और ना ही अब जानना चाहता हूँ । 
                                         बाकि कुछ और घटा तो फिर बताऊंगा .. बशर्ते इंटरनेट चालू रहे क्योंकि मैं अब इंटरनेट का पैसा नही पटाऊंगा ये ठान लिया हूँ ।
                 बाकि गुरूहरि इच्छा


शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

प्रणव कहिन - भ्रष्टाचार पर खामोश रहो

भाजपा के चूक चुके राष्ट्रीय नेता आडवाणी नें संप्रग पर भ्रष्टाचार बढाने और भ्रष्टों को संरक्षण देने का आरोप लगाए जिसके जवाब में प्रणव मुखर्जी नें एक डायलागी बयान दिया कि भाजपा को भ्रष्टाचार पर मुंह खोलने का कोई अधिकार नही है क्योकि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष कैमरे में रिश्वत लेते देखे जा चुके हैं । 
         तो जरा प्रणव साहेब आप बतायें कि क्या हम पत्रकारीता करने वालों को जनता की समस्या छोडकर अब नेताओं के पीछे पीछे चलना पडेगा कि कौन कब कहां किससे कितनी घूस मांग रहा है । प्रणव मुखर्जी को खुद बोलने से पहले सोचना चाहिये कि किस बात पर वो मूर्ख बन जाएंगे । एक बंगारू के रिश्वत लेने का मामला किनारे करके जरा प्रणव साहेब आफ जवाब दिजिये कि आपकी टीम के कलमुंहे कलमाणी की काली करामात कितनी घिनौनी थी जिसकी वजह से पूरा देश अफने को ठगा महसूस कर रहा है औऱ तो औऱ कलमाडी कांड के तुरंत बाद राजा की कहानी भी सामने आ गई । अब आप ठहरे वित्त मंत्री सो जरा हिसाब किताब करके आप ही बता दें कि जितना धन आपके दो आदमीयों नें खाया उससे देश की पूरी जनता के बीच यदि बांटा जाता तो एक एक के हिस्से में कितना धन आता । भई हमें तो हिसाब किताब नही आता पर इतना जरूर जानते हैं कि देश के सारे नागरिकों का कर्जा उतर जाता । 
                           अब छोडो बंगारू की बात और केन्द्र की करनी की बात करते हैं । आपके साथी तो इतने कमीने और बेशरम है कि उन्हे देश का अनाज सडना पसंद है मगर बांटना गवारा नही है । खुद सैकडा पार फैक्ट्रीयां लगा कर रखे हैं और अपने धंधे की खातिर देश के नागरिकों को चूना लगा रहे हैं । सोनिया राहुल की बात छोडो उनकी औकात तो बिहारी बाबूओं नें बता दिये हैं अपने मनमोहन की सोचो जिसके कंधे पर भी एस.आर.पी. (सोनिया राहुल प्रियंका) की एक बंदुक वैसे ही रखी है जैसे कलमाणी, राजा, क्वात्रोची, सहित सभी कांग्रेसीयों पर रखी हुई है ( आप भी अपने कंधे देख लें) लोकतंत्र की आढ में देश में चल रही राजशाही कहीं कत्लेआम में ना बदल जाए क्योंकि पूरा विश्व गवाह है कि यदि जनता बागी होती है तो शांति राजशाही के खत्म होने के बाद ही होती है । इसलिये सावधान हो जाओ और अपने कंधे को साफ करके सोचो कि तुम राजवंश के वफादार हो या देश के ।
 
               
बुधवार, 24 नवंबर 2010

narbali

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

का कहन सुदर्शन जी



                                       सुदर्शन जी का बयान देश की राजनीती में भूचाल ला रहा है । हर बार की तरह फिर से कांग्रेस की डुबती नैय्या को सोनिया ही पार लगा रही हैं । महंगाई, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, घोटाला और संघ को भगवा आतंकवाद कहने जैसे मुद्दों के बीच अचानक कांग्रेस को सोनिया के भूतकाल की आक्सीजन मिल गई है । के.एस. सुदर्शन पूर्व संघ प्रमुख भी है इसलिये इनके बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिये क्योकि अगर सोनिया अवैध होने के बयान को छोड भी दिया जाए तो बाकि आरोप यदि सच हुए तो ? जरा गौर फरमाएं इस लिंक पर सुरेश चिपलूनकर  जहां सोनिया जी के साथ साथ पूरे गांधी परिवार का इतिहास मिल जाएगा । इसलिये मत देखिये कि ये सब मनगढंत कहानी है इसलिये देखिये क्योंकि इसे हर भारतीय को देखना चाहिये और विशेष रूप से हर युवा कांग्रेसी को ताकि वह देशभक्ति और परिवारवादी शक्ति में अंतर समझ सके । औऱ अगर फिर भी कुछ कमी लगे तो भारतीय संसद में हुई इस कार्यवाही को पढें । कोई ये ना सोचे कि सुदर्शन नें एक महिला के बारे में चिप्पणी करे हैं बल्कि ये सोचें कि उनकी टीप्पणी भारत की सबसे शक्तिशाली महिला के विरूद्ध की गई है जो अपने आपको असहाय सी बताती हुई दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों में प्रथम दस में स्थान बनाने में कामयाब होती आ रही है, ये चमत्कार नही एक पूरी सोचा समझी साजिश है जिससे आम जनता का वास्ता है ।
                                अफसोस ये है कि भारतीय मिडिया भी बडे प्यार से सोनिया को बेचारी बताना चाह रही है । आज का अखबार देखिये और न्यूज चैनलों में झांकिये और बताइये कितने लोग कह रहे हैं कि सुदर्शन नें सोनिया को इंदिरा और राजीव का हत्यारा कहे हैं । नही .. कोई नही कह रहा है सभी एक ही राग अलाप रहे हैं कि सोनिया को अवैध संतान कह दिया जबकि हमें ये नही सोचना है कि वो किसकी संतान है बल्कि ये सोचना है कि अगर उन्होने देश के दो राजनेताओं को मारने का षणयंत्र रचा है तो फिर हम उन्हे कहां बैठा कर रखे हुए है यानि कि अब हम वो दिन भी देख सकते हैं जब सोनिया कसाब को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दे क्योकि जाहिर है कि एक व्यापारी दुसरे व्यापारी की मदद भले ना करे पर एक अपराधी दुसरे  अपराधी को बचाने का प्रयास जरूर करता है ।
                           इस समय संघ को एक साथियों के साथ खडे  होने की जरूरत है चाहे संघ का कोई व्यक्ति कैसे भी बयान क्यों ना दे संघ को चाहिये कि वह इस समय सबसे केवल एक ही बात कहे कि संघ को भगवा आतंवादी संगठन बनाने पर तुली सोनिया कांग्रेस के प्रति उसके स्वयं सेवकों की एक भडास है । यदि संघ अपने हर कार्य़कर्ता से दूरी बनाते चले जाएगा तो आमजन भी संघ से दूरी रखना चाहेगा । उसे डर लगेगा कि यदि उसने देश भक्ति के प्रवाह संघ का साथ दिया और एन समय पर अगर संघ नें साथ छोड दिया तो  ?  तो ...... अब आप क्या सोचें कि आप जो पढ रहे हैं या देख रहे हैं वह आपकी मर्जी है या दुसरे के बताए नजरिये पर आप सोच रहे हैं ।
गुरुवार, 11 नवंबर 2010

एक सच्चा राजनेता दे दे बाबा

प्रवक्ता डॉट पर सूरज तिवारी ‘मलय’ का लेख पढने को मिला । लेख से बढिया तस्वीर लगी इसलिये फटाफट कापी पेस्ट करके यहां चिपका दिया । मैं पिछले तीन चार दिनों से भ्रष्टाचार पर लिखे लेख पढता रहा, उनसे संबंधित खबरें छानता रहा लेकिन हर बार इसके इतिहास में जाने में नाकाम होता रहा । फिर ऐसे ही विचार आया कि दिमाग में घुमडते सवालों की बारिश कर ही दूँ तो लिजिये पेशे खिदमत है अनुसलझे प्रश्नों की अजीब भ्रष्टाचारी सवालों में उलझता आमजन -
  1.  - 15 अगस्त 1947 को जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री किसने बनाया, जबकि आम           चुनाव 1952 में हुए थे ?
  2. आजादी के बाद क्रांतीकारीयों को नजरअंदाज करते हुए केवल कांग्रेस को ही देश का सच्चा हितैषी क्यों बताया गया , जबकि भारतीय क्रांतीकारी हरकतों से त्रस्त होकर और भारत की बढती आबादी को नियंत्रित ना कर पाने की भावी संभावनाएं भी एक कारण थी ब्रटिश शासन के भारत छोडने के लिये ?
  3. संघ को भगवा आतंकवादी कहने वाली कांग्रेस अपने को भ्रष्टाचार की अम्मा कहने से क्यों संकोच करती है ?
  4. अभी तक हुए देश के सभी बडे भ्रष्टाचार कांग्रेस के शासन काल में ही हुए हैं चाहे वह बोफोर्स हो या अब तक का कॉमनवेल्थ फिर भी उसे ही सत्ता का मोह क्यों  ?
  5. प्रादेशिक पार्टीयों में भी कांग्रेस का साथ हमेशा भ्रष्ट दल ही क्यों देते हैं ?
                                           अब सवालों को छोड कर काम पर लगने वाली बातों पर आ जाया जाए । सारा देश आज महंगाई और भ्रष्टाचार से हलाकान है, गृहणीयों की बातें छोडें और अपनी सोचें तो भी बहुत बुरा हाल दिखाई देता है । कहीं भी जाओ भ्रष्टाचार हर रूप में दिखलाई पड रहा है , चाहे आप सडक पर चलें या पुल पर, बच्चों के खेल मैदान में जाएं या फिर उद्यानों में, सरकारी शौचालयों का हाल देखें या फिर सरकारी अस्पतालों का .. हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है । सडकें गढ्ढों में तब्दील हो जाती हैं लेकिन किसी भी सरकारी दफ्तर पर कोई फर्क नही पडता क्योंकि हिस्सा सब जगह पहुंच चुका होता है । नालियां अधुरी बना कर रोक दी जाती हैं क्योंकि ठेकेदार को पूरा पैसा और अफसरों को पूरा कमीशन मिल चुका होता है । आप कहीं भी जाकर किसी भी जगह देखकर भ्रष्टाचार को पहचान सकते हैं । इन फैलते अमर बेल की लताओं से निपटने के लिये सारे सरकारी दावे खोखले हो जाते हैं बडी मछलियां निकल जाती है और छोटी को पकड कर वाहवाही लुटी जाती है ।
                                                           आज जनता को चाहिये कि वह अपने अधिकारों को पहचाने यह कहना लिखना आसान है परन्तु अमल में लाना नामुकिन .. जो जनता आज तक अपने वोटो की किमत नही समझ सकी है वह अपने बाकि अधिकारों को क्या जानेगी । आने वाले समय में फिर से कांग्रेस अपना परचम लहराएगी क्योंकि लालू,  मुलायम औऱ पासवान की तिकडी उसके काम आएगी ।

जय देश , जय भारत ?
बुधवार, 10 नवंबर 2010

संघ बचाओ वरना देश गवांओ

यदि आप भारतीय हैं और भारत देश को बचाना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को बचाना होगा । ये मत सोचिये कि क्यों बचाएं , बल्कि ये सोचिये कि यदि हम संघ को नही बचाएंगे तो देश को कौन बचाएगा । चाहे आप किसी भी धर्म के हों या किसी भी दल से ताल्लुक रखते हों उससे कोई फर्क नही पडता क्योंकि संघ को मानने वाला व्यक्ति एक भारतीय ही हो सकता है । आरएसएश की कार्य प्रणाली चाहे कैसी भी हो उसकी राष्ट्रभक्ति पर कोई दाग आज तक नही लगा है फिर ये अचानक संघ के कार्यकर्ताओं पर बम धमाकों जैसे घृणित आरोप क्यों लग रहे हैं ? आज जबकि हर आम आदमी केन्द्र शासन का कायराना हरकतें देख रहा है कि किस तरह काश्मीर पर अलगाववादी तत्वों के देशद्रोही पूर्ण बयानों के जारी होने के बाद भी यह निकम्मा शासन शांत बैठा हुआ है और संघ के पदाधिकारीयों पर लग रहे आरोपों पर खुश होकर ताली बजा रहा है तो ये हर हिंदुस्तानी का फर्ज बनता है कि वह केन्द्र में बैठी सरकार से पुछे कि एक राष्ट्रवादी भारतीय संगठन पर आरोप तय करवाने वाली सरकार  उमर अब्दुल्ला, राहुल गांधी, अरूंधती राय जैसे नेताओं के बारे में क्या सोच रखती है ( राहुल गांधी- जिन्हे सिमि और संघ का अंतर इसलिये नही पता क्योकि ये एक गरीब लोगों के बीच में रहने वाले लोग हैं इसलिये थोडा अनपढ जैसे हो रहे हैं )

                          लिखने को तो मैं औऱ भई बहुत कुछ लिख सकता हूँ लेकिन अफने कुछ शुभचिंतकों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए इसे यहीं बंद कर रहा हूँ , केवल एक अनुरोध के साथ कि
             संघ बचेगा तभी हम देश को बचा सकेंगे ... वरना चीनी हमारी चीनी खाने कभी भी हमारे घर आ जाएंगे ।
रविवार, 7 नवंबर 2010

अगर हिचकी आए तो माफ़ करना.......

लड़कियों के डर भी अजीब होते हैं

भीड़ में हों तो लोगों का डर
अकेले में हों तो सुनसान राहों का डर
गर्मी में हों तो पसीने से भीगने का डर
हवा चले तो दुपट्टे के उड़ने का डर
कोई न देखे तो अपने चेहरे से डर
कोई देखे तो देखने वाले की आँखों से डर
बचपन हो तो माता-पिता का डर
राह में कड़ी धुप हो तो,चेहरे के मुरझाने का डर
बारिश आ जाये तो उसमें भीग जाने का डर


वो डरती हैं और तब तक डरती हैं
जब तक उन्हें कोई जीवन साथी नहीं मिल जाता
और वही वो व्यक्ति होता हैं जिसे वो सबसे ज्यादा डराती है!
हमें तो अपनों ने लूटा,गैरों में कहाँ दम था.
मेरी हड्डी वहाँ टूटी,जहाँ हॉस्पिटल बन्द था.



मुझे जिस एम्बुलेन्स में डाला,उसका पेट्रोल ख़त्म था.
मुझे रिक्शे में इसलिए बैठाया,
क्योंकि उसका किराया कम था.
मुझे डॉक्टरों ने उठाया,नर्सों में कहाँ दम था.
मुझे जिस बेड पर लेटाया,उसके नीचे बम था.
मुझे तो बम से उड़ाया,गोली में कहाँ दम था.
और मुझे सड़क में दफनाया,
क्योंकि कब्रिस्तान में फंक्शन था
नैनो मे बसे है ज़रा याद रखना,
अगर काम पड़े तो याद करना,
मुझे तो आदत है आपको याद करने की,
अगर हिचकी आए तो माफ़ करना.......
शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

याज्ञवल्क्य और मैत्रियी

याज्ञवल्क्य और मैत्रियी की कथा
महर्षि याज्ञवल्क्य वैदिक युग में एक अत्यन्त विद्वान व्यक्ति हुए हैं। वे ब्रह्मज्ञानी थे। उनकी दो पत्नियां थीं। एक का नाम कात्यायनी तथा दूसरी का मैत्रियी था । कात्यायनी सामान्य स्त्रियों के समान थीं, वह घर गृहस्थी में ही व्यस्त रहती थी। सांसारिक भोगों में उसकी अधिक रूचि थी। सुस्वादी भोजन, सुन्दर वस्त्र और विभिन्न प्रकार के आभूषणो में ही वह खोई रहती थी। याज्ञवल्क्य जैसे प्रसिद्ध महर्षि की पत्नी होते हुए भी उसका धर्म में उसे कोई आकर्षण नहीं दिखाई देता था। वह पूरी तरह अपने संसार में मोहित थी। जबकि मैत्रियी अपने पति के साथ प्रत्येक धार्मिक कार्य में लगी रहती थी। उनके प्रत्येक कर्मकाण्ड में सहायता देना तथा प्रत्येक आवश्यक वस्तु उपलब्ध कराने मे उसे आनन्द आता था। अध्यात्म में उसकी गहरी रूचि थी तथा अपने पति के साथ अधिक समय बिताने के कारण आध्यात्मिक जगत में उसकी गहरी पैठ थी। वह प्रायः महर्षि याज्ञवल्क्य के उपदेशों को सुनती, उनके धार्मिक क्रिया-कलापों में सहयोग देती तथा स्वंय भी चिन्तन-मनन में लगी रहती थी। सत्य को जानने की उसमें तीव्र जिज्ञासा थी।
एक बार महर्षि याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ त्यागकर संन्यास लेने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को अपने समीप बुलाया और उनसे बोले, 'हे मेरी प्रिय धर्मपत्नियों, मैं गृहस्थ त्यागकर संन्यास ले रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे पश्चात तुम दोनों में किसी प्रकार का विवाद न हो। इसलिए मेरी जो भी धन-सम्पत्ति है तथा घर में जो भी सामान है, उसे तुम दोनों में आधा-आधा बांट देना चाहता हूं।' कात्यायनी तुंरत तैयार हो गई लेकिन मैत्रियी सोचने लगी कि ऐसी क्या वस्तु है जो गृहस्थ से भी अधिक सुख, सतोंष देने वाली है और जिसे प्राप्त करने के लिए महर्षि गृहस्थ का त्याग कर रहे हैं। वह बोली, 'भगवन आप जिस स्थिति को प्राप्त करने के लिए गृहस्थ का त्याग कर रहे हैं, क्या वह इस गृहस्थ जीवन से अधिक मूल्यवान है?' महर्षि ने उत्तर दिया, 'मैत्रियी वह अमृत है, यह संसार नाशवान है। इसका सुख क्षणिक है, वह स्थायी आनन्द है। उसी की खोज में मैं अपना शेष जीवन व्यतीत कर देना चाहता हूं।' मैत्रियी फिर बोली, 'भगवन यदि धन-धान्य से पूर्ण यह समस्त पृथ्वी मुझे मिल जाए तो क्या मृत्यु मेरा पीछा छोड़ देगी, मैं अमर हो जाऊंगी।' महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा, 'प्रिय मैत्रियी, धन से तो सांसारिक वस्तुओं का ही प्रबंध किया जा सकता है। यह तो शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति, भोग-विलास तथा वैभव का ही साधन है। इससे अमरत्व का कोई सम्बंध नहीं है।' तब मैत्रियी ने कहा, 'यदि ऐसा है तो आप मुझे इससे क्यों बहला रहे हैं। मुझें इसकी आवश्यकता नहीं है। मुझे तो आप उस तत्व का उपदेश दीजिए जिसमें मैं सदा रहने वाला सुख पा सकूं। उसे जान सकूं जिसे जानने के पश्चात कुछ भी जानना शेष नहीं रहता तथा इस आवागमन के चक्र से मुफ्त होकर सदा-सदा के लिए अमर हो जाऊं।'
महर्षि अपनी पत्नी की सत्य के प्रति जिज्ञासा को जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी पत्नी की प्रशंसा करते हुए कहा, 'हे मैत्रियी, तुम्हारी इस सच्ची लगन को देखकर मैं पहले भी तुमसे प्रसन्न था और तुम्हें प्यार करता था,अब तुम्हारी बातें सुनकर मैं तुमसे बहुत अधिक प्रसन्न हूं, आओ, मेरे पास बैठो, मैं तुम्हें वह ज्ञान दूंगा जिससे वास्तव में तुम्हारी आत्मा का कल्याण होगा और तुम संसार के माया-मोह से सदा के लिए मुफ्त हो जाओगी।' और ऐसा ही हुआ, मैत्रियी ने अपने पति के द्वारा ज्ञान प्राप्त करके,ईश्वर को पा लिया और उसका मन स्थायी शांति तथा आनन्द से परिपूर्ण हो गया।

ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्मेति । (उस कल्याणकारी परमात्मा को जानकर ही भक्त अत्यन्त शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।)
गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

मेरी खबर: दिव्य गुप्त विज्ञान

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